Sunday, June 22, 2014

*श्रीकाशीविश्वेश्वरादिस्तोत्रम्*




*श्रीकाशीविश्वेश्वरादिस्तोत्रम्*


 

नमः श्रीविश्वनाथाय देववन्द्यपदाय ते ।
काशीशेशावतारो मे देवदेव ह्युपादिश ॥ १ ॥


हे देवदेव! आपने काशीमें शासन करनेके हेतु मङ्गलमूर्ति शिवके रुपमें अवतार लिया है। आप विश्वके नाथ हैं. देवता आपके चरणोंकी वन्दना करते हैं, आप मुझे उपदेश दें, आपको नमस्कार है ॥ १॥
 


मायाधीशं महात्मानं सर्वकारणकारणम् ।
वन्दे तं माधवं देवं यः काशीं चाधितिष्ठति ॥ २ ॥


जो मायाके अधीश्वर हैं, महान आत्मा हैं, सभी कारणोंके कारण हैं और जो काशीको सदा अपना अधिष्ठान बनाये हुए हैं, ऐसे उन भगवान माधवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥

 

वन्दे तं धर्मगोप्तारं सर्वगुह्यार्थवेदिनम् ।
गणदेवं ढुण्ढिराजं तं महान्तं सुविघ्नहम् ॥ ३ ॥


जो बड़े-से-बड़े विघ्नको अनायास ही बिना किसी प्रकारका श्रम किये ही नष्ट कर देते हैं, धर्मके रक्षक और सभी गुह्य (रहस्यपूर्ण) अर्थोंके वेत्ता हैं, ऐसे उन महान् ढुण्ढिराज गणपतिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥



भारं वोढुं स्वभक्तानां यो योगं प्राप्त उत्मम् ।
तं सढुण्ढिं दण्डपाणिं वन्दे गङ्गातटस्थितम् ॥ ४ ॥




जिन्होंने अपने भक्तोंका भार वहन करनेके लिये उत्तम योग प्राप्त किया है, ऐसे गङ्गातटपर स्थित ढुण्ढिराज सहित भगवान् दण्डपाणिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥



भैरवं दंष्ट्राकरालं भक्ताभयकरं भजे ।
दुष्टदण्डशूलशीर्षधरं वामाध्वचारिणम् ॥ ५ ॥



बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले, भक्तोंको अभय कर देनेवाले, वाममार्गका आचरण करनेवाले, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये शूल तथा शीर्ष (कपाल) धारण करनेवाले भगवान् भैरवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥


श्रीकाशीं पापशमणीं दमनीं दुष्टचेतसः ।
स्वर्निःश्रेणिं चाविमुक्तपुरीं मर्त्यहितां भजे ॥ ६ ॥




श्रीकाशी पापोंका शमन तथा दुष्टचित्तवालोंका दमन करनेवाली और स्वर्गकी सीढ़ी है। यह भगवान् शिवके द्वारा कभी न परित्याग किये जानेवाली है, (इसलिये इसे 'अविमुक्तपुरी' कहा जाता है), मृत्युलोकके प्राणियोंके लिये यह हितकारिणी है। इस पुरीका मैं सेवन करता हूँ ॥ ६ ॥


नमामि चतुराराध्यां सदाऽणिम्नि स्थितिं गुहाम् ।
श्रीगङ्गे भैरवीं दूरीकुरु कल्याणि यातनाम् ॥ ७ ॥



विद्वानोंद्वारा आराध्य, अणिमा ऐश्वर्यमें स्थित गुहाको मैं नमस्कार करता हूँ। हे कल्याणरुपिणी गङ्गे! आप मेरी भैरवी यातनाको दूर कर दें ॥ ७ ॥


भवानि रक्षान्नपूर्णे सद्वर्णितगुणेऽम्बिके ।
देवर्षिवन्द्याम्बुमणिकर्णिकां मोक्षदां भजे ॥ ८ ॥




हे अन्नपूर्णे, हे अम्बिके, हे सत्पुरुषोंके द्वारा वर्णित गुणोंवाली भवानि! आप हमारी रक्षा कीजिये। देवताओं और ऋषियोंद्वारा वन्द्य तथा समस्त संसारको मोक्ष प्रदान करनेवाली जलमयी मणिकर्णिकाका मैं सेवन करता हूँ ॥ ८  ॥

 

॥ इति श्रीकाशीविश्वेश्वरादिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥



॥ इस प्रकार श्रीकाशीविश्वेश्वरादि स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥





Monday, June 16, 2014

शिवस्तुतिः (श्रीस्कनदमहापुराणे कुमारिकाखण्डे)



~ शिवस्तुतिः ~


स्कन्द उवाच:


नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय ।
नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय ॥ १  ॥



:: स्कन्दजी बोले- जो सब प्रकारके रोग-शोकसे रहित हैं, उन कल्याणस्वरुप भगवान् शिव को नमस्कार है। जो सबके भीतर मनरुपसे निवास करते हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित भगवान् शङ्करको नमस्कार है। भक्तजनों पर निरन्तर कृपा करनेवाले आप भगवान् महेश्वरको नमस्कार है ॥ १ ॥


नमो भवायास्तु भवोद्भवाय नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय ।
नमोऽस्तु ते गूढमहाव्रताय नमोऽस्तु मायागहनाश्रयाय ॥ २ ॥



:: सबकी उत्पत्तिके कारण भगवान् भवको नमस्कार है। भगवन्! आप भवके उद्भव (संसारके स्त्रष्टा) हैं, आपको नमस्कार है। कामदेवका विध्वंस करनेवाले आपको नमस्कार है। आप गूढ़भावसे महान् व्रतका पालन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप मायारुपी गहन वनके आश्रय हैं अथवा सबको आश्रय देनेवाला आपका स्वरुप योगमायासमावृत होनेके कारण दुर्बोध है, आपको नमस्कार है ॥ २ ॥


नमोऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय ।
नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय ॥ ३ ॥



:: प्रलयकालमें जगतका संहार करनेवाले 'शर्व' नामधारी आपको नमस्कार है। शिवस्वरुप आपको नमस्कार है। आप पुरातन सिद्धरुप हैं, आपको नमस्कार है। कालरुप आपको नमस्कार है। आप सबकी कलना (गणना) करनेवाले होनेके कारण 'कल' नामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है। आप कालकी कलाका अतिक्रमण करके उससे बहुत दूर रहते हैं, आपको नमस्कार है॥ ३ ॥


नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नमोऽस्त्वमेयोक्षमहर्द्धिकाय ।
नमः शरण्याय नमोऽगुणाय नमोऽस्तु ते भीमगुणानुगाय ॥ ४ ॥



:: आप स्वाभाविक ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप अप्रमेय महिमावाले वृषभ तथा महासमृद्धिसे सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको शरण देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही निर्गुण ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके अनुगामी सेवक भयानक गुणसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४ ॥


नमोऽस्तु नानाभुवनाधिकर्त्रे नमोऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे ।
नमोऽस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन् सुकर्त्रे ॥  ५ ॥



:: नाना भुवनोंपर अधिकार रखनेवाले आपको नमस्कार है। हे भगवन्! आप ही सबका धारण-पोषण करनेवाले धाता तथा उत्तम कर्ता हैं, आपको सर्वदा नमस्कार है ॥ ५  ॥


अनन्तरुपाय सदैव तुभ्यमसह्यकोपाय सदैव तुभ्यम् ।
अमेयमानाय नमोऽस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोऽस्तु तुभ्यम् ॥ ६  ॥



:: आपके अनन्त रुप हैं, आपका कोप सबके लिये असह्य है, आपको सदैव नमस्कार है। आपके स्वरुपका कोई माप नहीं हो सकता, आपको नमस्कार है। वृषभेन्द्रको अपना वाहन बनानेवाले आप भगवान् महेश्वरको नमस्कार है ॥ ६ ॥


नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोऽस्तु ते व्याधिगणापहाय ।
चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ॥ ७ ॥



:: आप सुप्रसिद्ध महौषधरुप हैं, आपको नमस्कार है। समस्त व्याधियोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप चराचरस्वरुप, सबको विचार तत्त्वनिर्णयात्मिका शक्ति देनेवाले, कुमारनाथके नामसे प्रसिद्ध तथा परम कल्याणस्वरुप हैं, आपको नमस्कार है ॥ ७ ॥


ममेश भूतेश महेश्वरोऽसि कामेश वागीश बलेश धीश ।
क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोऽस्तु मोक्षेश गुहाशयेश ॥  ८ ॥



:: प्रभो! आप मेरे स्वामी हैं, सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर एवं महेश्वर हैं। आप ही समस्त भोगोंके अधिपति हैं। वाणी, बल और बुद्धिके अधिपति भी आप ही हैं। आप ही क्रोध और मोहपर शासन करनेवाले हैं। पर और अपर (कारण और कार्य)- के स्वामी भी आप ही हैं। सबकी ह्रदयगुहामें निवास करनेवाले परमेश्वर तथा मुक्तिके अधीश्वर भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है ॥ ८ ॥


शिव उवाच:


ये च सायं तथा प्रातस्त्वनकृतेन स्तवेन माम् ।
स्तीष्यन्ति परया भक्त्या श्रृणु तेषां च यत्फलम् ॥  ९  ॥



न व्याधिर्न च दारिद्र्यं न च चैवेष्टवियोजनम् ।
भुक्त्वा भोगान दुर्लभांश्च मभ यास्यन्ति सह्य ते ॥  १० ॥



:: शिवजीने कहा- जो लोग सायंकाल और प्रातःकाल पूर्ण भक्तिपूर्वक तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मेरा स्तवन करेंगे, उनको जो फल प्राप्त होगा, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो- उन्हें कोई रोग नहीं होगा, दरिद्रता भी नहीं होगी तथा प्रिय जनोंसे कभी वियोग भी न होगा। वे इस संसार में दुर्लभ भोगोंका उपयोग करके मेरे परमधामको प्राप्त करेंगे ॥ ९ - १०  ॥


॥ इति श्रीस्कनदमहापुराणे कुमारिकाखण्डे शिवस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके कुमारिकाखण्डमें शिवस्तुति सम्पूर्ण हुई ॥




Sunday, June 8, 2014

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम्


~ हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् ~

हिमालय उवाच:

त्वं ब्रह्मा सृष्टिकर्ता च त्वं विष्णुः परिपालकः ।
त्वं शिवः शिवदोऽनन्तः सर्वसंहारकारकः ॥ १ ॥



:: हिमालयने कहा-- [हे परम शिव!] आप ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। आप ही जगतके पालक विष्णु हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले अनन्त हैं और आप ही कल्याणकारी शिव हैं ॥ १ ॥

त्वमीश्वरो गुणातीतो ज्योतिरुपः सनातनः ।
प्रकृतिः प्रकृतीश्च प्राकृतः प्रकृतेः परः ॥ २ ॥

:: आप गुणातीत ईश्वर, सनातन ज्योतिःस्वरुप हैं। प्रकृति और प्रकृतिके ईश्वर हैं। प्राकृत पदार्थ होते हुए भी प्रकृतिसे परे हैं ॥ २ ॥

नानारुपविधाता त्वं भक्तानां ध्यानहेतवे ।
येषु रुपेषु यत्प्रीतिस्तत्तद्रूपं बिभर्षि च ॥ ३ ॥
 
:: भक्तोंके ध्यान करनेके लिये आप अनेक रुप धारण करते हैं। जिन रुपोंमें जिसकी प्रीति है, उसके लिये आप वही रुप धारण कर लेते हैं ॥ ३ ॥ 


सूर्यस्त्वं सृष्टिजनक आधारः सर्वतेजसाम् ।
सोमस्त्वं शस्य पाता च सततं शीतरश्मिना ॥ ४ ॥
 
:: आप ही सृष्टिके जन्मदाता सूर्य हैं। समस्त तेजोंके आधार हैं। आप ही शीतल किरणोंसे सदा शस्योंका पालन करनेवाले सोम हैं ॥ ४ ॥ 


वायुस्त्वं वरुणस्त्वं च त्वमग्निः सर्वदाहकः ।
इन्द्रस्त्वं देवराजश्च कालो मृत्युर्यमस्त्था ॥ ५ ॥
 
:: आप ही वायु, वरुण और सर्वदाहक अग्नि हैं। आप ही देवराज इन्द्र, काल, मृत्यु तथा यम हैं ॥ ५ ॥

मृत्युञ्जयो मृत्युमृत्युः कालकालो यमान्तकः ।
वेदस्त्वं वेदकर्ता च वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ६ ॥
 
:: मृत्युञ्जय होनेके कारण मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा यमके भी यम हैं। वेद, वेदकर्ता तथा वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत विद्वान भी आप ही हैं ॥ ६ ॥

विदुषां जनकस्त्वं च विद्वांश्च विदुषां गुरुः ।
मन्त्रस्त्वं हि जपस्त्वं हि तपस्त्वं तत्फलप्रदः ॥ ७ ॥


:: आप ही विद्वानोंके जनक, विद्वान तथा विद्वानोंके गुरु हैं। आप ही मन्त्र, जप, तप और उनके फलदाता हैं ॥ ७ ॥

वाक् त्वं वागधिदेवी त्वं तत्कर्ता तद्गुरुः स्वयम् ।
अहो सरस्वतीबीजं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ ८ ॥
 
:: आप ही वाक् और आप ही वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। आप ही उसके स्त्रष्टा और गुरु हैं।
अहो ! सरस्वतीबीजस्वरुप आपकी स्तुति यहाँ कौन कर सकता है ॥ ८ ॥


इत्येवमुक्तवा शैलेन्द्रस्तस्थौ धृत्वा पदाम्बुजम् ।
तत्रोवास तमोबोध्य चावरुह्य वृषाच्छिवः ॥ ९ ॥
 
:: ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय उन (भगवान् शिवजी) -के चरणकमलोंको पकड़कर खड़े रहे। भगवान् शिवने वृषभसे उतरकर शैलराजको प्रबोध देकर वहाँ निवास किया ॥ ९ ॥ 


स्तोत्रमेतन्महापुण्यं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो भयेभ्यश्च भवार्णवे ॥ १० ॥
 

:: जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवसागरमें रहकर भी समस्त पापों तथा भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥


अपुत्रो लभते पुत्रं मासमेकं पठेद् यदि ।
भार्याहीनो लभेद् भार्यां सुशीलां सुमनोहराम् ॥ ११ ॥
 
पुत्रहीन मनुष्य यदि एक मासतक इसका पाठ करे तो पुत्र पाता है। भार्याहीनको सुशीला तथा परम मनोहारिणी भार्या प्राप्त होती है ॥ ११ ॥


चिरकालगतं वस्तु लभते सहसा ध्रुवम् ।
राज्यभ्रष्टो लभेद् राज्यं शङ्करस्य प्रसादतः ॥ १२ ॥
 
:: वह चिरकालसे खोयी हुई वस्तुको सहसा तथा अवश्य पा लेता है। राज्यभ्रष्ट पुरुष भगवान् शंकरके प्रसादसे पुनः राज्यको प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥

कारागारे श्मशाने च शत्रुग्रस्तेऽतिसङ्कटे ।
गभीरेऽतिजलाकीर्णे भग्नपोते विषादने ॥ १३ ॥



रणमध्ये महाभीते हिंस्त्रजन्तुसमन्विते ।
सर्वतो मुच्यते स्तुत्वा शङ्करस्य प्रसादतः ॥ १४ ॥


॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


:: कारागार, श्मशान और शत्रु-संकटमें पड़नेपर तथा अत्यन्त जलसे भरे गम्भीर जलाशयमें नाव टूट जानेपर, विष खा लेनेपर, महाभयंकर संग्रामके बीच फँस जानेपर तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर इस स्तुतिका पाठ करके मनुष्य भगवान् शंकरकी कृपासे समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३-१४ ॥ 


इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणमें हिमालकृत शिवस्तोतत्र सम्पूर्ण हुआ ॥





Monday, June 2, 2014

श्रीरुद्राष्टकं - श्रीगोस्वामितुलसीदासकृत







नमामी शमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेsहं ॥ १ ॥

I bow to the Ruler of the Universe, whose very form is Liberation,
the omnipotent and all pervading Brahma, manifest as the Vedas.
I worship Shiva, shining in his own glory, without physical qualities,
Undifferentiated, desireless, all pervading sky of consciousness
and wearing the sky itself as His garment.

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोsहं ॥ २ ॥

I bow to the supreme Lord who is the formless source of “OM”
The Self of All, transcending all conditions and states,
Beyond speech, understanding and sense perception,
Awe-full, but gracious, the ruler of Kailash,
Devourer of Death, the immortal abode of all virtues.

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा
लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥ ३ ॥

I worship Shankara, whose form is white as the Himalyan snow,
Radiant with the beauty of countless Cupids,
Whose head sparkles with the Ganga
With crescent moon adorning his brow and snakes coiling his neck.

चलतकुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुंडमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥

The beloved Lord of All,
with shimmering pendants hanging from his ears,
Beautiful eyebrows and large eyes,
Full of Mercy with a cheerful countenance and a blue speck on his throat.

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखंडं अजं भानुकोटीप्रकाशं ।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणीं
भजेsहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥ ५ ॥

I worship Shankara, Bhavani’s husband,
The fierce, exalted, luminous supreme Lord.
Indivisible, unborn and radiant with the glory of a million suns;
Who, holding a trident, tears out the root of the three-fold suffering,
And who is reached only through Love.

कालातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्द दातापुरारी ।
चिदानंद संदोह मोहापहारी
प्रसिद प्रसिद प्रभो मन्मथारी ॥ ६ ॥

You who are without parts, ever blessed,
The cause of universal destruction at the end of each round of creation,
A source of perpetual delight to the pure of heart,
Slayer of the demon, Tripura, consciousness and bliss personified,
Dispeller of delusion…
Have mercy on me, foe of Lust.

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजंतीह लोके परे वा नाराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसिद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥ ७ ॥

Oh Lord of Uma, so long as you are not worshipped
There is no happiness, peace or freedom from suffering
in this world or the next.
You who dwell in the hearts of all living beings,
and in whom all beings have their existence,
Have mercy on me, Lord.

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोsहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८ ॥

I don’t know yoga, prayer or rituals,
But everywhere and at every moment, I bow to you, Shambhu!
Protect me my Lord, miserable and afflicted as I am
with the sufferings of birth, old-age and death.


रुद्राष्टकम इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भु: प्रसीदति ॥ ९ ॥

।। इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ।।

https://www.facebook.com/notes/s-chandra-sekhar/%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A4%AE-%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4/411539094494

Sunday, August 11, 2013

शम्भुस्तुतिः (श्रीब्रह्मपुराणे शम्भुस्तुतिः)


'शम्भुस्तुतिः'

श्रीराम उवाच: 

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणः नमामि सर्वज्ञमपारभावम् । 
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥ १

नमामि देवं परमव्ययं तमुमापतिं लोकगुरुं नमामि । 
नमामि दारिद्र्यविदारणं तं नमामि रोगपहरं नमामि ॥   

नमामि कल्याणमचिन्त्यरुपं नमामि विश्वोद्भवबीजरुपम् । 
नमामि विश्वस्थितिकारणं तं नमामि संहारकरं नमामि ॥

नमामि गौरिप्रियमव्ययं तं नमामि नित्यं क्षरमक्षरं तम् । 
नमामि चिद्रूपममेयभावं त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥

नमामि कारुण्यकरं भवस्य भयंकरं वाऽपि सदा नमामि । 
नमामि दातारमभीप्सितानां नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥

नमामि वेदत्रयलोचनं तं नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् । 
नमामि पुण्यं सदसद्व्यतीतं नमामि तं पापहरं नमामि ॥

नमामि विश्वस्य हिते रतं तं नमामि रुपाणि बहूनि धत्ते । 
यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥  

यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं तथागतिं लोकसदाशिवो यः । 
आराधितो यश्च ददाति सर्वं नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥

नमामि सोमेश्वरमस्वतन्त्रमुमापतिं तं विजयं नमामि । 
नमामि विघ्नेश्वरनन्दिनाथं पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥

नमामि देवं भवदुःखशोकविनाशनं चन्द्रधरं नमामि । 
नमामि गङ्गाधरमीशमीड्यमुमाधवं देववरं नमामि ॥ १०

नमाम्यजादीशपुरन्दरादिसुरासुरैरर्चितपादपद्मम् । 
नमामि देवीमुखवादनानामीक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत् ॥ ११

पञ्चामृतैर्गन्धसुधूपदीपैर्विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः । 
अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥ १२

॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

बिल्वाष्टकम्


'बिल्वाष्टकम्'

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम् ।
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ १ ॥

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्याच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
शिवपूजां करिष्यामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ २ ॥


अखण्डबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे ।
शुद्धयन्ति सर्वपापेभ्यो बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ ३ ॥


 शालिग्रामशिलामेकां विप्राणां जातु अर्पयेत् ।
सोमयज्ञमहापुण्यं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ ४ ॥


दन्तिकोटिसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च ।
कोटिकन्यामहादानं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ ५ ॥


लक्ष्म्या स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम् ।
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ ६ ॥


दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ ७ ॥


मूलतो ब्रह्मरुपाय मध्यतो विष्णुरुपिणे ।
अग्रतः शिवरुपाय बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ ८ ॥


बिल्वाष्टमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधो ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ॥ ९ ॥

 
॥ इति बिल्वाष्टकं सम्पूर्णम् ॥ 

Photo: https://www.facebook.com/pages/Pashupati-Nath-Mandir-Mandsaur/170045343148558

Monday, July 22, 2013

श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ..


~ श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ~

 

 विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं

पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।

यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नमः इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ १



जो अपने ह्रदय स्थित दर्पणमें दृश्यमान नगरी-सदृश विश्व को निद्राद्वारा स्वप्नकी भाँति मायाद्वारा बाहर प्रकट हुए की तरह आत्मामें देखते हुए ज्ञान होने पर अथवा निद्रा भांग होने पर अपने अद्वितीय आत्माका साक्षात्कार करते हैं, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्ती को यह मेरा नमस्कार है ॥ १ ॥ 

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं शनै-

र्मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् ।

मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नमः इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ २ 



जिन्होंने महायोगीकी तरह अपनी इच्छासे सृष्टिके पूर्व निर्विकल्प-रुपसे स्थित इस जगत् को बीजके भीतर स्थित अङ्कुरकी भाँति मायाद्वारा कल्पित देश, काल और धारणाकी विचित्रतासे चित्रित किया है तथा मायावी-सदृश जँभाई लेते हुए-से दीखते हैं, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्तिको मेरा नमस्कार है ॥  

 

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते

साक्षात् तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।

यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ३ 



जिसका सदात्मक स्फुरण ही असत्-तुल्य भासित होता है, जो अपने आश्रितोंको 'साक्षात् तत्त्वमसि' अर्थात् 'तुम साक्षात् वही ब्रह्म हो' इस वेद-वाक्यद्वारा ज्ञान प्रदान करते हैं तथा जिनका साक्षात्कार करने से पुनः भवसागरमें आवागमन नहीं होता, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्तिको यह मेरा नमस्कार है ॥  

 

नानाछिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं

ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते ।

जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत् समस्तं जगत्

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥



अनेक छिद्रोंवाले घटके भीतर स्थित विशाल दीपककी उज्जवल प्रभाके समान ज्ञान जिनके नेत्र आदि इन्द्रियोंद्वारा बाहर प्रसरित होता है तथा जैसा मैं समझता हूँ कि उसीके प्रकाशित होनेपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है, उन श्रीदक्षिणामूर्तिको यह मेरा नमस्कार है ॥
 

 

 देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिँ च शून्यं विदुः

स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।

मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणे

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥



भ्रमित हुए बहुवादी-शून्यवादी बौद्ध आदि देह, प्राण, इन्द्रियोंको तथा तीव्र बुद्धिको भी स्त्री, बालक, अंध और जड़की तरह शून्य मानते हैं तथा 'अहं' को ही प्रधानता देते हैं, ऐसे माया-शक्तिके विलाससे कल्पित महामोहका संहार करनेवाले उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्तिको यह मेरा नमस्कार है ॥
 

 

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्

सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत् सुषुप्तः पुमान् ।

प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नमः इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥



जो पुरुष राहुद्वारा ग्रस्त सूर्य-चन्द्रके समान मायाद्वारा समाच्छादित होनेके कारण सन्मात्रका इन्द्रियोंद्वारा उपसंहार करके सो गया था, उसे निद्रामें लीन होनेपर अथवा जागनेके पश्चात जो प्रत्यभिज्ञातुल्य भासित होता है, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्ति को मेरा नमस्कार है ॥
 

 

 बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि

व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।

स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ७



जो अपने भक्तोंके समक्ष भद्रा मुद्राद्वारा बाल, युवा, वृद्ध, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा सभी व्यावर्तित अवस्थाओंमें भी अनुवर्तमान एवं सदा 'अहं' रुपसे अन्तःकरणमें स्फुरमाण स्वात्माको प्रकट करते हैं, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्तिको यह मेरा नमस्कार है ॥
 

 

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः

शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः ।

स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामित-

स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ८ 



जिनकी मायाद्वारा परिभ्रमित हुआ यह पुरुष स्वप्न अथवा जाग्रत-अवस्थामें विश्वको कार्य-कारण, स्वामी-सेवक, शिष्य-आचार्य तथा पिता-पुत्रके भेदसे देखता है, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्तिको यह नमस्कार है ॥
 

 

 भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमा-

नित्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ।

नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात् परस्माद्विभो-

स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ९



जिनकी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, पुरुष__ये आठ मूर्तियाँ ही इस चराचर जगतके रुपमें प्रकाशित हो रही है तथा विचारशीलोंके लिये जिन परात्पर विभुके अतिरिक्त अन्य नहीं हैं, उन श्रीगुरुस्वरुप श्रीदक्षिणामूर्तिको यह मेरा नमस्कार है ॥
 

 

 सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे

तेनास्य श्रवणात् तदर्थमननाद्धयानाच्च संकीर्तनात् ।

सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादिश्वरत्वं स्वतः

सिध्येत् तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥ १०



चूँकि इस स्तोत्रमें यह स्पष्ट किया गया है कि यह चराचर जगत् सर्वात्मस्वरुप है, इसलिये इसका श्रवण, इसके अर्थका मनन, ध्यान और संकीर्तन करनेसे स्वतः सर्वात्मस्वरुप महाविभूतिसहित ईश्वरत्वकी प्राप्ति होती है, पुनः आठ रुपोंमें परिणत हुआ स्वछन्द ऐश्वर्य भी सिद्ध हो जाता है ॥ १०
 

 

 वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं

सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।

त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं

जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥ ११



जो वटवृक्षके समीप भूमिभागपर स्थित हैं, निकट बैठे हुए समस्त मुनिजनोंको ज्ञान प्रदान कर रहे हैं, जन्म-मरणके दुःखका विनाश करनेमें प्रवीण हैं, त्रिभुवनके गुरु और ईश हैं, उन भगवान् दक्षिणामूर्तिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ११

 

 

 चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा ।

गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥ १२  



आश्चर्य तो यह है कि उस वटवृक्षके नीचे सभी शिष्य वृद्ध हैं और गुरु युवा हैं। साथही गुरुका व्याख्यान भी मौन भाषामें है, किंतु उसीसे शिष्योंके संशय नष्ट हो गये हैं ॥ १२ 


 

 ॥ इति श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


॥ इस प्रकार श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥




~ ॐ श्रीमहागुरुवे नमः ~